श्रीगोपालभट्टगोस्वामि पाद का आविर्भाव 1557 वैक्रमीय माघ कृष्ण तृतीया (सन् 1500 ई.) को दक्षिण प्रान्तस्थ वेलंगुड़ी ग्राम में हुआ था। आपके पिता श्रीर्वेकटभटजी प्रकाण्ड पण्डित थे। देशान्तरों में हरिनाम रस मन्दाकिनी प्रवाहित करते हुए प्रेमावतार महाप्रभु श्रीचैतन्यदेवजी वेलंगुड़ी आये और वहाँ चातुर्मास्य निवास कर श्रीगोपालभट्टजी को दीक्षा दी।
प्रभु के आदेशानुसार श्रीगोपालभट्टजी वृन्दावन आये और रासस्थली परिसरस्थित वेणुकूप पार्श्व में निवास करते हुए गौड़ीय दर्शन के अन्यतम षड्सन्दर्भ, भगवद्भक्तिविलास (श्रीहरिभक्ति-विलास), सत्क्रियासार, संस्कार दीपिका, कृष्णकर्णामृत की कृष्णवल्लभ टीका, दानखण्ड आदि ग्रन्थों की रचना की।